رَّبِّ اَعُوۡذُ بِکَ مِنۡ ھَمَزٰتِ الشَّیٰطِیۡنِ ۙ واَعُوۡذُ بِکَ رَبِّ اَنۡ یَّحۡضُرُوۡن ؕ۔
بِسۡمِ اللّٰهِ الرَّحۡمٰنِ الرَّحِيۡمِۙ۔
इस्लामिक शिक्षाएं
सभी इस्लामिक शिक्षाएं इंसानियत पर केंद्रित हैं। अल्लाह तआला ने जो भी आदेश किताबों और धर्मग्रंथों के ज़रिए भेजे हैं, वे सभी इंसानियत को कायम करने और लोगों को एक खुदा की तरफ लाने के लिए हैं। इनमें से कुछ खास शिक्षाओं पर यहाँ चर्चा की जा रही है।
1. अल्लाह की सुन्नत (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं)।
इस्लाम की पहली शिक्षा अल्लाह की सुन्नत है, जिसका मतलब है 'ला इलाहा इल्लल्लाह' (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं)। वालिद मोहतरम आदम से लेकर अल्लाह के आखिरी पैगंबर मुहम्मद (उन पर शांति हो) तक, हर पैगंबर के लिए अल्लाह की यही सुन्नत रही है। और यही संदेश रहा है। सभी पैगंबरों ने यही संदेश दिया और इसी संदेश का प्रचार किया।
निःसंदेह, अल्लाह उस समय भी विद्यमान थे जब कुछ भी नहीं था। उस समय उनका सिंहासन जल पर था। उन्होंने इस ब्रह्मांड की रचना छह दिनों में की। अर्थात्, इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी विद्यमान है, चाहे वह हमारे लिए द्रश्य हो या अद्रश्य, सब कुछ अल्लाह की कुदरत है। अर्थात्, हम और इस ब्रह्मांड के सभी जीव भी अल्लाह की मात्र कुदरत अथार्थ माया हैं। इसलिए कुरान में अल्लाह कहते हैं, "अल्लाह के सिवा कोई नहीं है।"
इसलिए, इस्लाम की पहली शिक्षा हर जिन्न और मनुष्य के लिए यही है कि केवल उसी ईश्वर की पूजा करो, जो समस्त संसार का स्वामी है। किसी भी रूप में अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करो। फिर भले वो नबी ही क्यों न हो। जो अल्लाह के साथ किसी को शरीक करता है, उसे बहुदेववादी या काफ़िर कहा जाता है। अल्लाह कहता है कि क़यामत के दिन बड़े से बड़े गुनाहगार को भी माफ़ किया जा सकता है, परन्तु काफ़िर को माफ़ नहीं किया जाएगा।
شَرَعَ لَـكُمۡ مِّنَ الدِّيۡنِ مَا وَصّٰى بِهٖ نُوۡحًا وَّالَّذِىۡۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ وَمَا وَصَّيۡنَا بِهٖۤ اِبۡرٰهِيۡمَ وَمُوۡسٰى وَعِيۡسٰٓى اَنۡ اَقِيۡمُوا الدِّيۡنَ وَ لَا تَتَفَرَّقُوۡا فِيۡهِؕ ﴿۱۳﴾
Q-42:13तुम्हें उस धर्म का पालन करने का आदेश दिया गया है जिसका आदेश हमने नूह को दिया था और जो हमने तुम पर भी नाज़िल किया। और जिसका आदेश हमने इब्राहीम, मूसा और ईसा को दिया था: उस धर्म को स्थापित करो और उसमें फूट न डालो।
وَاِلٰهُكُمۡ اِلٰهٌ وَّاحِدٌ ۚ لَآ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ الرَّحۡمٰنُ الرَّحِيۡمُ ﴿۱۶۳﴾
Q-02:163और तुम्हारा ईश्वर एक ही है, उसके सिवा कोई ईश्वर नहीं, वह बड़ा महरबान और रहम करने वाला है।
اِنَّمَاۤ اِلٰهُكُمُ اللّٰهُ الَّذِىۡ لَاۤ اِلٰـهَ اِلَّا هُوَؕ وَسِعَ كُلَّ شَىۡءٍ عِلۡمًا ﴿۹۸﴾
Q-20:98निःसंदेह, तुम्हारा ईश्वर अल्लाह है, जिसके सिवा कोई ईश्वर नहीं, जो सर्वज्ञ है।
رَّبُّ السَّمٰوٰتِ وَالۡاَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَا فَاعۡبُدۡهُ وَاصۡطَبِرۡ لِـعِبَادَتِهٖؕ هَلۡ تَعۡلَمُ لَهٗ سَمِيًّا ﴿۶۵﴾
Q-19:65आकाश और पृथ्वी और उनके बीच की हर चीज़ के स्वामी की ईबादत करो। और उनकी ईबादत में धैर्य (सब्र) रखो। क्या तुम्हारे ज्ञान में उनके समान कोई है?
وَاِنَّ اللّٰهَ رَبِّىۡ وَرَبُّكُمۡ فَاعۡبُدُوۡهُ ؕ هٰذَا صِرَاطٌ مُّسۡتَقِيۡمٌ ﴿۳۶﴾
Q-19:36और निःसंदेह, अल्लाह मेरा और तुम्हारा रब है, इसलिए उसकी उपासना करो। यही सीधा मार्ग है।
2. कुरान की शरियत का पालन।
इस्लाम में विश्वास रखने वालों के लिए अल्लाह की सुन्नत (एक अल्लाह में आस्था) और अल्लाह की शरीयत (अल्लाह के कानून), यानी कुरान का पालन करना अनिवार्य है। और कुरान के पर व्यर्थ की किताबों को प्राथमिकता न दें। कुरान के कानून सभी मुसलमानों पर अनिवार्य हैं। जिन आयतों में अल्लाह ने कानून प्रकट किए हैं, वे मुहकम (स्पष्ट/निर्णायक) हैं, यानी वे सरल भाषा में हैं जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है। इसलिए, यह आवश्यक है: विद्वानों की हदीसों पर आधारित उपदेश सुनने के बजाय, अपनी मातृभाषा में कुरान का अनुवाद पढ़ें। अल्लाह सर्वशक्तिमान दुनिया के सभी मुसलमानों को गुमराही से बचाए और उन्हें हिदायत की बरकत अता करे। आमीन।
اِنَّ الَّذِىۡ فَرَضَ عَلَيۡكَ الۡقُرۡاٰنَ لَرَآدُّكَ اِلٰى مَعَادٍ ؕ قُلْ رَّبِّىۡۤ اَعۡلَمُ مَنۡ جَآءَ بِالۡهُدٰى وَمَنۡ هُوَ فِىۡ ضَلٰلٍ مُّبِيۡنٍ ﴿۸۵﴾
Q-28:85निस्संदेह, अल्लाह ने तुम पर कुरान फ़र्ज़ किया है। वह तुम्हें तुम्हारी मंजिल (मक्का अथवा परलोक) तक अवश्य पहुंचाएगा। कहो, "मेरा रब ही भली-भांति जानता है कि कौन मार्गदर्शित है और कौन स्पष्ट रूप से गुमराह है।"
وَمَاۤ اُمِرُوۡۤا اِلَّا لِيَعۡبُدُوا اللّٰهَ مُخۡلِصِيۡنَ لَـهُ الدِّيۡنَ ۙ حُنَفَآءَ وَيُقِيۡمُوا الصَّلٰوةَ وَيُؤۡتُوا الزَّكٰوةَ وَذٰلِكَ دِيۡنُ الۡقَيِّمَةِ ؕ ﴿۵﴾
Q-98:05और उन्हें केवल यही आदेश दिया गया था कि वे अल्लाह की इबादत करें, उसके प्रति सच्चे रहें, उसके सीधे मार्ग (शरीयत) का अनुसरण करें, नमाज़ कायम करें और ज़कात दें। और यही सीधा और स्थायी धर्म है।
وَمِنَ النَّاسِ مَنۡ يَّشۡتَرِىۡ لَهۡوَ الۡحَدِيۡثِ لِيُضِلَّ عَنۡ سَبِيۡلِ اللّٰهِ بِغَيۡرِ عِلۡمٍۖ وَّيَتَّخِذَهَا هُزُوًا ؕ اُولٰٓٮِٕكَ لَهُمۡ عَذَابٌ مُّهِيۡنٌ ﴿۶﴾
Q-31:06और लोगों में से कुछ ऐसे हैं जो व्यर्थ हदीसों को खरीद लेते हैं, ताकि वे बिना ज्ञान के (अर्थात जो ज्ञान कुरान से न हो! उससे) लोगों को अल्लाह के मार्ग से गुमराह कर सकें, और कुरान को मज़ाक बनालें। ये वे लोग हैं जिन्हें अपमानजनक अज़ाब मिलेगा।
अल्लाह फरमाता है! कि उसने अमानत (कुरान और शरीयत) आसमानों, ज़मीन और पहाड़ों के सामने पेश की, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। वे उससे डर गए। [मेरा मानना है कि यह घटना जिन्न और इंसानों की रचना से पहले घटी होगी। शायद अल्लाह इबादत के लिए ज़मीन, आसमान और पहाड़ों को चुनना चाहता होगा।]
लेकिन उनके इनकार के बाद, ईश्वर ने ईबादत के लिए जिन्नों की रचना की। लेकिन क्योंकि वे अग्नि तत्व से बने थे, इसलिए खुदा ने उन्मे स्थिरता नहीं पाई। इसके बाद, खुदा ने विशेष रूप से ईबादत के लिए मिट्टी से मनुष्यों की रचना की। और क्योंकि मनुष्य स्वभाव से कमजोर और उतावला है, शायद उसने जल्दबाजी में यह जिम्मेदारी उठा ली। इसीलिए ईश्वर मनुष्य को अन्यायी और अज्ञानी कहता है।
اِنَّا عَرَضۡنَا الۡاَمَانَةَ عَلَى السَّمٰوٰتِ وَالۡاَرۡضِ وَالۡجِبَالِ فَاَبَيۡنَ اَنۡ يَّحۡمِلۡنَهَا وَاَشۡفَقۡنَ مِنۡهَا وَحَمَلَهَا الۡاِنۡسَانُؕ اِنَّهٗ كَانَ ظَلُوۡمًا جَهُوۡلًا ۙ ﴿۷۲﴾ لِّيُعَذِّبَ اللّٰهُ الۡمُنٰفِقِيۡنَ وَالۡمُنٰفِقٰتِ وَالۡمُشۡرِكِيۡنَ وَالۡمُشۡرِكٰتِ وَيَتُوۡبَ اللّٰهُ عَلَى الۡمُؤۡمِنِيۡنَ وَالۡمُؤۡمِنٰتِؕ وَكَانَ اللّٰهُ غَفُوۡرًا رَّحِيۡمًا ﴿۷۳﴾
Q-33:72-73निस्संदेह, हमने आकाशों, पृथ्वी और पहाड़ों को अमानत (कुरान और शरीयत) पेश की, परन्तु उन्होंने इसे उठाने से इनकार कर दिया। और वे इससे डर गए। और मनुष्य ने इसे उठा लिया, और वह ज़ालिम और अज्ञानी था। (72) ताकि अल्लाह मुनाफिक पुरुष, मुनाफिक स्त्री, बहुदेववादी पुरुष और बहुदेववादी स्त्री को दंडित करे, और अल्लाह मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्री को क्षमा करे। और अल्लाह बख्शने वाला और महरबान है। (73)
3. लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश।
ईश्वर का आदेश है! समाज में प्रेम और शांति का संबंध स्थापित करें। एक-दूसरे के साथ सद्भाव से रहें। बड़ों का आदर करें। छोटों के साथ दयालुता से पेश आएं। दयालुता का पहला अधिकार माता-पिता के लिए है। दूसरा अधिकार रिश्तेदारों के लिए है। तीसरा अधिकार अनाथों और बेघरों के लिए है। चौथा अधिकार निकट पड़ोसियों के लिए है और फिर दूर के पड़ोसियों के लिए।
ईश्वर का आदेश है कि किसी का उपहास न करें। किसी को भी अपने से कमतर न समझें। हो सकता है कि कर्मों के लिहाज़ से ईश्वर की दृष्टि में उसका दर्जा आपसे कहीं अधिक हो। प्रत्येक मनुष्य ईश्वर की रचना है। और ईश्वर की रचना की हर वस्तु श्रेष्ठ है। इसलिए किसी को भी स्वयं को दूसरों से अधिक सुंदर या श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए। यह अहंकार का संकेत है। अतः सामने वाले व्यक्ति से सुंदर शब्दों में बात करना आवश्यक है। और उत्तर में भी उतने ही सुंदर शब्द कहने चाहिए, या कम से कम उन्हीं शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
وَّبِالۡوَالِدَيۡنِ اِحۡسَانًا وَّبِذِى الۡقُرۡبٰى وَالۡيَتٰمٰى وَالۡمَسٰكِيۡنِ وَالۡجَـارِ ذِى الۡقُرۡبٰى وَالۡجَـارِ الۡجُـنُبِ وَالصَّاحِبِ بِالۡجَـنۡۢبِ وَابۡنِ السَّبِيۡلِ ۙ وَمَا مَلَـكَتۡ اَيۡمَانُكُمۡ ؕ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ مَنۡ كَانَ مُخۡتَالًا فَخُوۡرَا ۙ ﴿۳۶﴾
Q-04:36और माता-पिता, रिश्तेदारों, अनाथों, जरूरतमंदों, निकट पड़ोसियों, दूर पड़ोसियों, साथियों, राहगीरों और उन सभी के साथ अच्छा व्यवहार करो जिन पर तुम्हारा अधिकार है। बेशक, अल्लाह घमंडी और अभिमानी लोगों को पसंद नहीं करता।
يٰۤاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا لَا يَسۡخَرۡ قَوۡمٌ مِّنۡ قَوۡمٍ عَسٰٓى اَنۡ يَّكُوۡنُوۡا خَيۡرًا مِّنۡهُمۡ وَلَا نِسَآءٌ مِّنۡ نِّسَآءٍ عَسٰٓى اَنۡ يَّكُنَّ خَيۡرًا مِّنۡهُنَّۚ وَلَا تَلۡمِزُوۡۤا اَنۡفُسَكُمۡ وَلَا تَنَابَزُوۡا بِالۡاَلۡقَابِؕ بِئۡسَ الِاسۡمُ الۡفُسُوۡقُ بَعۡدَ الۡاِيۡمَانِ ۚ وَمَنۡ لَّمۡ يَتُبۡ فَاُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الظّٰلِمُوۡنَ ﴿۱۱﴾
Q-49:11ऐ ईमान वालो! एक कौम दूसरी कौम की निंदा न करे, हो सकता है कि वे उनसे श्रेष्ठ हों, और न ही औरतें औरतों की निंदा करें, हो सकता है कि वे उनसे श्रेष्ठ हों। और एक-दूसरे की चुगली न करो, न एक-दूसरे को अपशब्द कहो। ईमान के बाद अपशब्द कहना बुराई है, और जो पश्चाताप नहीं करता, वही गुनाहगार है।
وَالتِّيۡنِ وَالزَّيۡتُوۡنِۙ ﴿۱﴾ وَطُوۡرِ سِيۡنِيۡنَۙ ﴿۲﴾ وَهٰذَا الۡبَلَدِ الۡاَمِيۡنِۙ ﴿۳﴾ لَقَدۡ خَلَقۡنَا الۡاِنۡسَانَ فِىۡۤ اَحۡسَنِ تَقۡوِيۡمٍ ﴿۴﴾
Q-95:01-04अंजीर और जैतून (1) और पहाड़ सिना (2) और इस सुरक्षित शहर (मक्का) (3) की कसम, हमने निश्चित रूप से मनुष्य को सर्वोत्तम रूप में बनाया है (4)
وَاِذَا حُيِّيۡتُمۡ بِتَحِيَّةٍ فَحَيُّوۡا بِاَحۡسَنَ مِنۡهَاۤ اَوۡ رُدُّوۡهَا ؕ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَلٰى كُلِّ شَىۡءٍ حَسِيۡبًا ﴿۸۶﴾
Q-04:86और जब कोई तुम से बात करे, तो तुम उससे बेहतर बात करो, या उसके जैसे शब्दों में जवाब दो। बेशक, अल्लाह हर बात का हिसाब रखने में सक्षम है।
4. अंतिम दिन और शाश्वत जीवन।
और क़यामत के दिन पर विश्वास रखो, जब दूसरा सूर बजाया जाएगा, और उस ध्वनि के साथ धरती सारे मुर्दे बाहर निकाल फेंकेगी, और आत्माओं को मिलाया जाएगा। फिर लोग तितर-बितर होकर तीन समूहों में बंट जाएंगे। और फिर हर व्यक्ति को धरती पर किए गए अपने अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब देना होगा। उस अदालत में, एक ईश्वर पर विश्वास करने वाले और कानून का पालन करने वाले सर्वोच्च होंगे। उन्हें न तो डर होगा और न ही वे दुखी होंगे। अविश्वासियों और गुनाहगारों को अपमानित और लज्जित किया जाएगा।
الَّذِيۡنَ يُؤۡمِنُوۡنَ بِالۡغَيۡبِ وَيُقِيۡمُوۡنَ الصَّلٰوةَ وَمِمَّا رَزَقۡنٰهُمۡ يُنۡفِقُوۡنَۙ ﴿۳﴾
Q-02:03जो परलोक पर विश्वास करते हैं, नमाज़ कायम रखते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से खर्च करते हैं। (वे ही सफल हैं)
اِذَا زُلۡزِلَتِ الۡاَرۡضُ زِلۡزَالَهَا ۙ ﴿۱﴾ وَاَخۡرَجَتِ الۡاَرۡضُ اَثۡقَالَهَا ۙ ﴿۲﴾ يَوۡمَٮِٕذٍ يَّصۡدُرُ النَّاسُ اَشۡتَاتًا ۙ لِّيُرَوۡا اَعۡمَالَهُمۡؕ ﴿۶﴾ فَمَنۡ يَّعۡمَلۡ مِثۡقَالَ ذَرَّةٍ خَيۡرًا يَّرَهٗ ؕ ﴿۷﴾ وَمَنۡ يَّعۡمَلۡ مِثۡقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَّرَهٗ ﴿۸﴾
Q-99:01-02, 06-08जब धरती भूकंप से कांप उठेगी। ﴿1﴾ और धरती अपने भीतर की हर चीज को बाहर निकाल देगी।﴿2﴾ और उन्हें उनके कर्मों को दिखाया जाएगा। (6) इसलिए जिसने एक कण के बराबर भी भलाई की है, वह उसे देखेगा। ﴿7﴾ और जिसने एक कण के बराबर भी बुराई की है, वह उसे देखेगा। ﴿8﴾
لَهُمۡ جَنّٰتٌ تَجۡرِىۡ مِنۡ تَحۡتِهَا الۡاَنۡهٰرُ خٰلِدِيۡنَ فِيۡهَاۤ اَبَدًا ؕ ﴿۱۱۹﴾
Q-05:119सत्यवादियों के लिए ऐसे बाग हैं जिनके नीचे नदियाँ बहती हैं, और जहाँ वे सदा निवास करेंगे।
5. सभी पैगंबरों और उनकी किताबों में विश्वास।
सभी नबियों और उन पर अवतरित पुस्तकों (तौराह, इंजील, भजन संहिता और पवित्र पांडुलिपियों) पर विश्वास लाओ। और अपने नबी और अन्य नबियों में भेद न करो। क्योंकि सभी नबी अपने-अपने युगों की एक श्रृंखला हैं। बेशक, अल्लाह सर्वशक्तिमान ने कुरान को पूर्ण घोषित किया है। लेकिन प्रथम पुस्तकें और पवित्र शास्त्र भी कुरान की ही शिक्षा देते हैं, बशर्ते कि उन पुस्तकों के मिश्रित भाग को हटा दिया जाए।
इस मिश्रित भाग को अलग करने का साधन कुरान है, जिसके बारे में अल्लाह सर्वशक्तिमान कहते हैं: कुरान अपने से पहले की किताबों की पुष्टि करता है और उनकी विस्तृत व्याख्या करता है। दूसरे तरीके के बारे में अल्लाह सर्वशक्तिमान कहते हैं: अल्लाह के आदेश में कोई बड़ा विरोधाभास नहीं है। इसलिए, जहाँ कहीं भी सत्य के साथ विरोधाभास है, वह निश्चित रूप से एक मिश्रित भाग है।
قُوۡلُوۡٓا اٰمَنَّا بِاللّٰهِ وَمَآ اُنۡزِلَ اِلَيۡنَا وَمَآ اُنۡزِلَ اِلٰٓى اِبۡرٰهٖمَ وَاِسۡمٰعِيۡلَ وَاِسۡحٰقَ وَيَعۡقُوۡبَ وَالۡاَسۡبَاطِ وَمَآ اُوۡتِىَ مُوۡسٰى وَعِيۡسٰى وَمَآ اُوۡتِىَ النَّبِيُّوۡنَ مِنۡ رَّبِّهِمۡۚ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ اَحَدٍ مِّنۡهُمۡ وَنَحۡنُ لَهٗ مُسۡلِمُوۡنَ ﴿۱۳۶﴾
Q-02:136, 03:84(मुसलमान) कहते हैं: हम अल्लाह पर और उस पर विश्वास करते हैं जो हम पर नाज़िल हुआ है, और जो इब्राहीम, इस्माइल, इसहाक, याकूब और उनकी औलाद पर नाज़िल हुआ, और जो मूसा और ईसा को दिया गया, और जो उनके रब की ओर से अन्य पैगंबरों को दिया गया। हम उनमें से किसी में कोई भेद नहीं करते। और हम उसी अल्लाह के प्रति समर्पित मुसलमान हैं।
وَالۡمُؤۡمِنُوۡنَ كُلٌّ اٰمَنَ بِاللّٰهِ وَمَلٰٓٮِٕكَتِهٖ وَكُتُبِهٖ وَرُسُلِهٖ﯀ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ اَحَدٍ مِّنۡ رُّسُلِهٖ﯀ وَقَالُوۡا سَمِعۡنَا وَاَطَعۡنَا غُفۡرَانَكَ رَبَّنَا وَاِلَيۡكَ الۡمَصِيۡرُ ﴿۲۸۵﴾
Q-02:285और हर वह मोमिन जो अल्लाह, उसके फरिश्तों, उसकी किताबों और उसके पैगंबरों पर विश्वास रखता है, और कहता है: हम अल्लाह के पैगंबरों और अपने पैगंबर में कोई अंतर नहीं करते। और वे कहते हैं: हमने (तेरा हुक्म) सुना और कुबूल किया। ऐ हमारे रब, हम तुझसे क्षमा मांगते हैं। और हमे तेरे ही पास लौटना है।
وَمَا كَانَ هٰذَا الۡقُرۡاٰنُ اَنۡ يُّفۡتَـرٰى مِنۡ دُوۡنِ اللّٰهِ وَلٰـكِنۡ تَصۡدِيۡقَ الَّذِىۡ بَيۡنَ يَدَيۡهِ وَتَفۡصِيۡلَ الۡكِتٰبِ لَا رَيۡبَ فِيۡهِ مِنۡ رَّبِّ الۡعٰلَمِيۡنَ ﴿۳۷﴾
Q-10:37यह कुरान अल्लाह के सिवा किसी और ने नहीं रचा है। बल्कि, यह इससे पहले के धर्मग्रंथों की पुष्टि और उनका विस्तृत विवरण है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह संसार के स्वामी की ओर से है।
اَفَلَا يَتَدَبَّرُوۡنَ الۡقُرۡاٰنَؕ وَلَوۡ كَانَ مِنۡ عِنۡدِ غَيۡرِ اللّٰهِ لَوَجَدُوۡا فِيۡهِ اخۡتِلَافًا كَثِيۡرًا ﴿۸۲﴾
Q-04:82क्या वे कुरान पर विचार नहीं करते? यदि यह अल्लाह के सिवा किसी और की ओर से होता, तो उन्हें इसमें अनेक विरोधाभास मिलते। (82)
وَالَّذِيۡنَ يُؤۡمِنُوۡنَ بِمَۤا اُنۡزِلَ اِلَيۡكَ وَمَاۤ اُنۡزِلَ مِنۡ قَبۡلِكَۚ وَبِالۡاٰخِرَةِ هُمۡ يُوۡقِنُوۡنَؕ ﴿۴﴾ اُولٰٓٮِٕكَ عَلٰى هُدًى مِّنۡ رَّبِّهِمۡ وَاُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ ﴿۵﴾
Q-02:04-05और जो लोग ईमान रखते हैं! उसपर जो (हे मुहम्मद) आप पर अवतरित हुआ है और जो आपसे पहले अवतरित हुआ है, उस पर भी विश्वास रखते हैं, और जो परलोक के प्रति दृढ़ निश्चयी हैं, (4) वे अपने प्रभु के मार्गदर्शन में हैं। और वे ही सफल होंगे। (5)
6. फुरकान (तराजू) स्थापित करें।
न कम तौले और न कम नापे। तराजू को ईमानदारी से सेट करें। कम तौलना और कम नापना खुदा की नज़र में बहुत बड़ा अन्याय है। खुदा ने शोएब AS की कौम मदीन के लोगों को कम तौलने और कम नापने के कारण नष्ट कर दिया था, ताकि वे एक सबक बन सकें।
कम तौलने से रोज़ी नहीं बढ़ती, बल्कि बरकत चली जाती है। रोज़ी-रोटी खुदा के हाथ में है। वह जिसके लिए चाहता है उसकी रोज़ी बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है कम कर देता है। इसलिए पापी न बनें।
اِنَّ رَبَّكَ يَبۡسُطُ الرِّزۡقَ لِمَنۡ يَّشَآءُ وَيَقۡدِرُؕ اِنَّهٗ كَانَ بِعِبَادِهٖ خَبِيۡرًۢا بَصِيۡرًا ﴿۳۰﴾
Q-17:30बेशक, आपका रब जिसे चाहे उसके लिए रोज़ी बढ़ाता है और जिसे चाहे उसके लिए कम कर देता है। वह अपने बंदों के बारे में जानता है और उन्हें देखता है।
فَاَوۡفُوا الۡكَيۡلَ وَالۡمِيۡزَانَ وَلَا تَبۡخَسُوا النَّاسَ اَشۡيَآءَهُمۡ وَلَا تُفۡسِدُوۡا فِى الۡاَرۡضِ بَعۡدَ اِصۡلَاحِهَا ؕ ذٰ لِكُمۡ خَيۡرٌ لَّـكُمۡ اِنۡ كُنۡتُمۡ مُّؤۡمِنِيۡنَ ۚ ﴿۸۵﴾
Q-07:85इसलिए पूरा नाप-तौल करो और लोगों की संपत्ति में कमी न करो, और जब धरती पर शांति और सुरक्षा हो, तो उसमें भ्रष्टाचार न फैलाओ। और अगर तुम ईमान वाले हो, तो यही तुम्हारे लिए बेहतर है।
وَاَوۡفُوا الۡـكَيۡلَ اِذَا كِلۡتُمۡ وَزِنُوۡا بِالۡقِسۡطَاسِ الۡمُسۡتَقِيۡمِؕ ذٰ لِكَ خَيۡرٌ وَّاَحۡسَنُ تَاۡوِيۡلًا ﴿۳۵﴾
Q-17:35और जब तुम नापो तो पूरा नापो, और सही तराज़ू से तोलो। यही बेहतर है और इसका परिणाम भी अच्छा होगा।
7. पृथ्वी पर कोई उपद्रव नहीं।
और धरती पर उपद्रव (फ़साद) न फैलाओ। किसी के साथ ज़्यादती न करो। अगर कोई बुरा कहे, तो भलाई से जवाब दो। लोगों के बीच सुलह कराओ। अल्लाह उन्हें पसंद नहीं करता जो धरती पर फ़साद फैलाते हैं।
وَلَا تُفۡسِدُوۡا فِى الۡاَرۡضِ بَعۡدَ اِصۡلَاحِهَا وَادۡعُوۡهُ خَوۡفًا وَّطَمَعًا ؕ اِنَّ رَحۡمَتَ اللّٰهِ قَرِيۡبٌ مِّنَ الۡمُحۡسِنِيۡنَ ﴿۵۶﴾
Q-07:56और जब धरती को व्यवस्थित कर दिया गया हो, तो उसमें फ़साद न फैलाओ। और उससे डर और उम्मीद के साथ प्रार्थना करो। बेशक, अल्लाह की रहमत नेक काम करने वालों के करीब है।
وَاِذَا قِيۡلَ لَهُمۡ لَا تُفۡسِدُوۡا فِىۡ الۡاَرۡضِۙ قَالُوۡاۤ اِنَّمَا نَحۡنُ مُصۡلِحُوۡنَ ﴿۱۱﴾ اَلَا ۤ اِنَّهُمۡ هُمُ الۡمُفۡسِدُوۡنَ وَلٰـكِنۡ لَّا يَشۡعُرُوۡنَ ﴿۱۲﴾
Q-02:11-12और जब उनसे कहा जाता है, "धरती पर फ़साद न फैलाओ," तो वे कहते हैं, "हम तो बस सुधार करने वाले हैं।" (11) असल में, फ़साद तो वही फैलाते हैं, लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं होता। (12)
وَقُلْ لِّعِبَادِىۡ يَقُوۡلُوا الَّتِىۡ هِىَ اَحۡسَنُؕ اِنَّ الشَّيۡطٰنَ يَنۡزَغُ بَيۡنَهُمۡؕ اِنَّ الشَّيۡطٰنَ كَانَ لِلۡاِنۡسَانِ عَدُوًّا مُّبِيۡنًا ﴿۵۳﴾
Q-17:53और मेरे बंदों से कहो कि वे वही बात कहें जो सबसे अच्छी हो। क्योंकि शैतान उनके बीच फूट डालता है। सच तो यह है कि शैतान हमेशा से ही इंसान का खुला दुश्मन रहा है।
اِدۡفَعۡ بِالَّتِىۡ هِىَ اَحۡسَنُ السَّيِّئَةَ ؕ نَحۡنُ اَعۡلَمُ بِمَا يَصِفُوۡنَ ﴿۹۶﴾
Q-23:96बुराई का जवाब उससे बेहतर चीज़ से दो। वे जो कहते हैं, उसे हम अच्छी तरह जानते हैं।
وَلَا تَقۡتُلُوا النَّفۡسَ الَّتِىۡ حَرَّمَ اللّٰهُ اِلَّا بِالۡحَـقِّ ؕ وَمَنۡ قُتِلَ مَظۡلُوۡمًا فَقَدۡ جَعَلۡنَا لِـوَلِيِّهٖ سُلۡطٰنًا فَلَا يُسۡرِفْ فِّى الۡقَتۡلِ ؕ اِنَّهٗ كَانَ مَنۡصُوۡرًا ﴿۳۳﴾
Q-17:33और उस जान को कत्ल न करो, जिसे अल्लाह ने हराम (वर्जित) ठहराया है, सिवाय हक़ के। और जो कोई नाहक़ मारा जाए, तो हमने उसके वारिस को अधिकार दिया है, लेकिन उसे बदला लेने में हद से आगे नहीं बढ़ना चाहिए। बेशक, उसे [कानून का] संरक्षण प्राप्त है।
8. ज़कात दें।
और यह कि आपको अपनी मेहनत की कमाई का कुछ हिस्सा—जो आपको बहुत प्यारा है—गरीबों, अनाथों, रिश्तेदारों और लोगों को आज़ाद कराने पर खर्च करो। खुदा को आपका खर्च करना पसंद है। ईश्वर इस दुनिया में आपके खर्च का दोगुना लौटाता है। जबकि परलोक में वह आपकी नीयत के अनुसार आपको इसका चार गुना, सात गुना, सौ गुना और सात सौ गुना तक इनाम देगा।
وَاٰتَى الۡمَالَ عَلٰى حُبِّهٖ ذَوِى الۡقُرۡبٰى وَالۡيَتٰمٰى وَالۡمَسٰكِيۡنَ وَابۡنَ السَّبِيۡلِۙ وَالسَّآٮِٕلِيۡنَ وَفِى الرِّقَابِۚ وَاَقَامَ الصَّلٰوةَ وَاٰتَى الزَّکٰوةَ ۚ وَالۡمُوۡفُوۡنَ بِعَهۡدِهِمۡ اِذَا عٰهَدُوۡاۚ وَالصّٰبِرِيۡنَ فِى الۡبَاۡسَآءِ وَالضَّرَّآءِ وَحِيۡنَ الۡبَاۡسِؕ اُولٰٓٮِٕكَ الَّذِيۡنَ صَدَقُوۡاؕ وَاُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الۡمُتَّقُوۡنَ ﴿۱۷۷﴾
Q-02:177और जो अपनी दौलत से प्यार होने के बावजूद उसे रिश्तेदारों, अनाथों, ज़रूरतमंदों, मुसाफ़िरों और गुलामों को आज़ाद करने में खर्च करता है। और जो नमाज़ कायम करता है और ज़कात देता है। और जब वह कोई वादा करता है, तो उसे पूरा करता है। और वह मुश्किलों, परेशानियों और लड़ाई-झगड़े के समय सब्र से काम लेता है। यही सच्चे लोग हैं और यही नेक लोग हैं।
وَمَاۤ اُمِرُوۡۤا اِلَّا لِيَعۡبُدُوا اللّٰهَ مُخۡلِصِيۡنَ لَـهُ الدِّيۡنَ ۙ حُنَفَآءَ وَيُقِيۡمُوا الصَّلٰوةَ وَيُؤۡتُوا الزَّكٰوةَ وَذٰلِكَ دِيۡنُ الۡقَيِّمَةِ ؕ ﴿۵﴾
Q-98:05और उन्हें बस यही हुक्म दिया गया था कि वे अल्लाह की इबादत करें, धर्म में पूरी तरह ईमानदार रहें, सच्चाई की ओर क़दम बढ़ाएं, नमाज़ कायम करें और ज़कात दें। और यही सच्चा और हमेशा रहने वाला धर्म है।
وَرَحۡمَتِىۡ وَسِعَتۡ كُلَّ شَىۡءٍ ؕ فَسَاَكۡتُبُهَا لِلَّذِيۡنَ يَتَّقُوۡنَ وَيُؤۡتُوۡنَ الزَّكٰوةَ وَالَّذِيۡنَ هُمۡ بِاٰيٰتِنَا يُؤۡمِنُوۡنَ ۚ ﴿۱۵۶﴾
Q-07:156और मेरी दया (रहमत) हर चीज़ को घेरे हुए है। मैं इसे उन लोगों को दूँगा जो भलाई करते हैं, दान देते हैं और हमारी निशानियों (आयात) पर विश्वास करते हैं।
مَنۡ ذَا الَّذِىۡ يُقۡرِضُ اللّٰهَ قَرۡضًا حَسَنًا فَيُضٰعِفَهٗ لَهٗ وَلَهٗۤ اَجۡرٌ كَرِيۡمٌ ۚ ﴿۱۱﴾
Q-57:11वह कौन है जो अल्लाह को अच्छा कर्ज़ दे, ताकि वह उसे कई गुना बढ़ा दे? और उसके लिए बड़ा इनाम है।
مَثَلُ الَّذِيۡنَ يُنۡفِقُوۡنَ اَمۡوَالَهُمۡ فِىۡ سَبِيۡلِ اللّٰهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ اَنۡۢبَتَتۡ سَبۡعَ سَنَابِلَ فِىۡ كُلِّ سُنۡۢبُلَةٍ مِّائَةُ حَبَّةٍؕ وَاللّٰهُ يُضٰعِفُ لِمَنۡ يَّشَآءُ ؕ وَاللّٰهُ وَاسِعٌ عَلِيۡمٌ ﴿۲۶۱﴾
Q-02:261जो लोग अल्लाह की राह में अपना धन खर्च करते हैं, उनकी मिसाल उस अनाज के दाने जैसी है जिससे सात बालियाँ उगती हैं और हर बाली में सौ दाने होते हैं। और अल्लाह जिसे चाहे, उसके लिए (इनाम को) कई गुना बढ़ा देता है। और अल्लाह सब कुछ घेरे हुए है और सब कुछ जानने वाला है।
9. खुदा का शुक्र अदा करो।
अल्लाह का शुक्र अदा करें। अल्लाह का शुक्र अदा करने का सबसे अच्छा तरीका सजदा करना, यानी नमाज़ पढ़ना है। हर मुसलमान के लिए नमाज़ पढ़ना फ़र्ज़ है। यह एक ऐसा काम है जिसमें बंदा अपने रब के सामने सर रखकर अपनी बंदगी ज़ाहिर करता है।
قَدۡ اَفۡلَحَ مَنۡ تَزَكّٰىۙ (۱۴) وَذَكَرَ اسۡمَ رَبِّهٖ فَصَلّٰى ؕ (۱۵)
Q-87:14-15सचमुच, वही सफल हुआ जिसने खुद को पवित्र किया (14) और अपने रब का नाम याद किया और नमाज़ कायम की।
اِنَّنِىۡۤ اَنَا اللّٰهُ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّاۤ اَنَا فَاعۡبُدۡنِىۡۙ وَاَقِمِ الصَّلٰوةَ لِذِكۡرِىۡ ﴿۱۴﴾
Q-20:14बेशक, मैं ही अल्लाह हूँ। मेरे सिवा कोई इबादत के लायक नहीं, इसलिए मेरी ही इबादत करो और मुझे याद करने के लिए नमाज़ कायम करो।
مَا يُرِيۡدُ اللّٰهُ لِيَجۡعَلَ عَلَيۡكُمۡ مِّنۡ حَرَجٍ وَّلٰـكِنۡ يُّرِيۡدُ لِيُطَهِّرَكُمۡ وَلِيُتِمَّ نِعۡمَتَهٗ عَلَيۡكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُوۡنَ ﴿۶﴾
Q-05:06खुदा नमाज़ के ज़रिए आप पर कोई कठिनाई नहीं डालना चाहता, बल्कि वे आपको पवित्र करना और आप पर अपनी कृपा पूरी करना चाहता हैं, ताकि आप कृतज्ञ (शुक्रगुजार) बन सको।
وَمَاۤ اُمِرُوۡۤا اِلَّا لِيَعۡبُدُوا اللّٰهَ مُخۡلِصِيۡنَ لَـهُ الدِّيۡنَ ۙ حُنَفَآءَ وَيُقِيۡمُوا الصَّلٰوةَ وَيُؤۡتُوا الزَّكٰوةَ وَذٰلِكَ دِيۡنُ الۡقَيِّمَةِ ؕ ﴿۵﴾
Q-98:05और उन्हें बस यही हुक्म दिया गया था कि वे अल्लाह की इबादत करें, धर्म में पूरी तरह ईमानदार रहें, सच्चाई की ओर बढ़े, नमाज़ कायम करें और ज़कात दें। और यही सच्चा और हमेशा रहने वाला धर्म है।
10. मृत्यु का समय निश्चित।
जीवन और मृत्यु अल्लाह के हाथ में है। न तो किसी बहुत बूढ़े व्यक्ति की उम्र बढ़ाई जाती है और न ही कम उम्र में मरने वाले बच्चे की उम्र कम की जाती है। बल्कि, मौत अल्लाह द्वारा तय किए गए एक निश्चित समय पर आती है, जो पवित्र पुस्तक 'लौह-ए-महफ़ूज़' (सुरक्षित पट्टिका) में दर्ज है।
अगर किसी की मौत बिना किसी वाजिब वजह के हत्या या किसी हादसे में होती है, तो वह भी अपने तय समय पर ही होती है। लेकिन ईश्वर ने इंसान को धरती पर आज़माइश और अपनी इबादत के लिए भेजा है, न कि किसी को मारने या खुद मारे जाने के लिए। इसलिए, हत्यारा एक बहुत बड़े गुनाह का भागीदार बनता है। ईश्वर का कहना है! अगर कोई व्यक्ति किसी एक इंसान की हत्या करता है, तो यह ऐसा है जैसे उसने पूरी इंसानियत की हत्या कर दी हो। यानी उसने सिर्फ़ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि अनगिनत लोगों को मारा है। और अगर उसने सब्र से काम लिया और किसी की जान बचाई, तो उसने अनगिनत जानें बचाईं। जिसका इनाम भी अनगिनत होगा।
وَمَا كَانَ لِنَفۡسٍ اَنۡ تَمُوۡتَ اِلَّا بِاِذۡنِ اللّٰهِ كِتٰبًا مُّؤَجَّلًا ؕ ﴿۱۴۵﴾
Q-03:145और कोई भी जीव अल्लाह की अनुमति के बिना नहीं मर सकता; यह एक तय किया हुआ फ़ैसला है।
وَاللّٰهُ خَلَقَكُمۡ مِّنۡ تُرَابٍ ثُمَّ مِنۡ نُّطۡفَةٍ ثُمَّ جَعَلَـكُمۡ اَزۡوَاجًا ؕ وَمَا تَحۡمِلُ مِنۡ اُنۡثٰى وَلَا تَضَعُ اِلَّا بِعِلۡمِهٖ﯀ وَمَا يُعَمَّرُ مِنۡ مُّعَمَّرٍ وَّلَا يُنۡقَصُ مِنۡ عُمُرِهٖۤ اِلَّا فِىۡ كِتٰبٍؕ اِنَّ ذٰلِكَ عَلَى اللّٰهِ يَسِيۡرٌ ﴿۱۱﴾
Q-35:11और अल्लाह ने तुम्हें मिट्टी से बनाया, फिर वीर्य की एक बूंद से, फिर उसने तुम्हें जोड़ों में बनाया। और कोई भी मादा उसकी जानकारी के बिना गर्भधारण नहीं करती और न ही बच्चे को जन्म देती है। और किसी भी जीव की आयु न तो लंबी होती है और न ही कम, सिवाय इसके कि वह पहले से दर्ज हो। वास्तव में: अल्लाह के लिए यह आसान है।
كَتَبۡنَا عَلٰى بَنِىۡۤ اِسۡرَآءِيۡلَ اَنَّهٗ مَنۡ قَتَلَ نَفۡسًۢا بِغَيۡرِ نَفۡسٍ اَوۡ فَسَادٍ فِى الۡاَرۡضِ فَكَاَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيۡعًا ؕ وَمَنۡ اَحۡيَاهَا فَكَاَنَّمَاۤ اَحۡيَا النَّاسَ جَمِيۡعًا ؕ ﴿۳۲﴾
Q-05:32हमने बनी-इसराईल के लिए यह नियम बनाया था कि जिसने किसी इंसान की जान ली—सिवाय बदले के या ज़मीन पर फ़साद फैलाने के—तो मानो उसने पूरी इंसानियत की जान ले ली। और जिसने किसी की जान बचाई, तो मानो उसने पूरी इंसानियत की जान बचाई।
11. वचन/शपथ पूरी करें।
ईश्वर के नाम पर ली गई शपथ और दिए गये वचनों को पूरा करना एक आस्तिक (मोमिन) की पहचान है। यह भी सच है कि एक मोमिन तब तक शपथ नहीं लेता या वचन नहीं देता। जब तक कि बहुत ज़रूरी न हो। इसके विपरीत, एक झूठा और धोखेबाज़ व्यक्ति दिन भर शपथ लेता है और वादे करता है, और ईश्वर को गवाह बनाता है। ईश्वर मोमीनों को अपनी शपथ पूरी करने का आदेश देते हैं। ईश्वर सच्चे लोगों की परीक्षा उनकी सच्चाई से लेते हैं।
وَ اَوۡفُوۡا بِعَهۡدِ اللّٰهِ اِذَا عَاهَدتُّمۡ وَلَا تَنۡقُضُوا الۡاَيۡمَانَ بَعۡدَ تَوۡكِيۡدِهَا وَقَدۡ جَعَلۡتُمُ اللّٰهَ عَلَيۡكُمۡ كَفِيۡلًا ؕ اِنَّ اللّٰهَ يَعۡلَمُ مَا تَفۡعَلُوۡنَ ﴿۹۱﴾ وَلَا تَكُوۡنُوۡا كَالَّتِىۡ نَقَضَتۡ غَزۡلَهَا مِنۡۢ بَعۡدِ قُوَّةٍ اَنۡكَاثًا ؕ تَتَّخِذُوۡنَ اَيۡمَانَكُمۡ دَخَلًاۢ بَيۡنَكُمۡ اَنۡ تَكُوۡنَ اُمَّةٌ هِىَ اَرۡبٰى مِنۡ اُمَّةٍ ؕ اِنَّمَا يَبۡلُوۡكُمُ اللّٰهُ بِهٖ ؕ وَلَيُبَيِّنَنَّ لَـكُمۡ يَوۡمَ الۡقِيٰمَةِ مَا كُنۡـتُمۡ فِيۡهِ تَخۡتَلِفُوۡنَ ﴿۹۲﴾
Q-16:91-92और जब तुम अल्लाह के नाम पर वचन दो, तो उसे पूरा करो; और अपनी कसमों को पक्का करने के बाद तोड़ो मत, जबकि तुमने अल्लाह को अपना गवाह बनाया है। बेशक, अल्लाह जानता है कि तुम क्या करते हो। (91) और उस व्यक्ति की तरह न बनो जिसने सूत कातकर गोला बनाया और फिर उसे खोल दिया और अपने लिए कोई रास्ता निकाल लिया। क्या तुम्हारा ईमान आपस में फूट डालने का ज़रिया है, ताकि एक गुट दूसरे से बेहतर हो सके? अल्लाह इसके ज़रिए बस तुम्हारी आज़माइश करता है, और वह कयामत के दिन तुम्हें ज़रूर बता देगा कि तुम किन बातों में मतभेद रखते थे। (92)
لَا يُؤَاخِذُكُمُ اللّٰهُ بِاللَّغۡوِ فِىۡۤ اَيۡمَانِكُمۡ وَلٰـكِنۡ يُّؤَاخِذُكُمۡ بِمَا عَقَّدْتُّمُ الۡاَيۡمَانَ ۚ فَكَفَّارَتُهٗۤ اِطۡعَامُ عَشَرَةِ مَسٰكِيۡنَ مِنۡ اَوۡسَطِ مَا تُطۡعِمُوۡنَ اَهۡلِيۡكُمۡ اَوۡ كِسۡوَتُهُمۡ اَوۡ تَحۡرِيۡرُ رَقَبَةٍ ؕ فَمَنۡ لَّمۡ يَجِدۡ فَصِيَامُ ثَلٰثَةِ اَيَّامٍ ؕ ذٰ لِكَ كَفَّارَةُ اَيۡمَانِكُمۡ اِذَا حَلَفۡتُمۡ ؕ وَاحۡفَظُوۡۤا اَيۡمَانَكُمۡ ؕ كَذٰلِكَ يُبَيِّنُ اللّٰهُ لَـكُمۡ اٰيٰتِهٖ لَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُوۡنَ ﴿۸۹﴾
Q-05:89खुदा आपसे जाने-अनजाने में खाई गई कसमों के लिए हिसाब नहीं मांगेंगे, लेकिन जो कसम आपने जान-बूझकर खाई है, उसके लिए वे आपसे हिसाब मांगेंगे। ऐसी कसम का प्रायश्चित यह है कि आप दस गरीब लोगों को वैसा ही खाना खिलाएं जैसा आप अपने परिवार को खिलाते हैं, या उन्हें कपड़े दें, या किसी गुलाम को आज़ाद करें। लेकिन जो ऐसा नहीं कर सकता, उसे तीन दिन का रोज़ा रखना चाहिए। जब आप कसम खाते हैं, तो यह आपकी कसमों का प्रायश्चित है। और अपनी कसमों का ध्यान रखें। इस तरह खुदा आपके लिए अपनी आयतें स्पष्ट करते हैं ताकि आप शुक्र गुज़ार बन सकें।
وَلَا تَقۡرَبُوۡا مَالَ الۡيَتِيۡمِ اِلَّا بِالَّتِىۡ هِىَ اَحۡسَنُ حَتّٰى يَبۡلُغَ اَشُدَّهٗ ؗ وَاَوۡفُوۡا بِالۡعَهۡدِۚ اِنَّ الۡعَهۡدَ كَانَ مَسۡـــُٔوۡلًا ﴿۳۴﴾
Q-17:34और अनाथ की संपत्ति के पास तब तक न जाएँ, जब तक वह बालिग़ न हो जाए, सिवाय उस तरीके के जो सबसे बेहतर हो। और अपने वादे को पूरा करें। बेशक, वादे को पूरा करना ज़रूरी है।
وَالۡمُوۡفُوۡنَ بِعَهۡدِهِمۡ اِذَا عٰهَدُوۡا ۚ وَالصّٰبِرِيۡنَ فِى الۡبَاۡسَآءِ وَالضَّرَّآءِ وَحِيۡنَ الۡبَاۡسِؕ اُولٰٓٮِٕكَ الَّذِيۡنَ صَدَقُوۡا ؕ وَاُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الۡمُتَّقُوۡنَ ﴿۱۷۷﴾
Q-02:177और जब वे कोई वादा करते हैं, तो उसे पूरा करते हैं। और वे मुश्किलों, परेशानियों और जंग के समय सब्र से काम लेते हैं। यही सच्चे लोग हैं - और यही मुत्तकी लोग हैं।
12. सच्ची गवाही दें।
खुदा न्याय और सच्चाई का आदेश देता हैं। खुदा फरमाता है: न्याय के लिए गवाही दो, भले ही वह तुम्हारे अपने, या तुम्हारे माता-पिता या किसी करीबी रिश्तेदार के ही खिलाफ क्यों न हो। न्याय करने में किसी भी तरह की कोताही न बरतें। खुदा फरमाता है: गवाही देते समय अमीर या गरीब का लिहाज़ न करें। जो कुछ आप जानते हैं, उसे बिना कुछ छिपाए बताएं। जो कोई इसे छिपाता है, वह पापी है।
कुछ लोग अस्पष्ट गवाही देते हैं। वे दोनों पक्षों को खुश करना चाहते हैं या अपनी इच्छाओं के कारण न्याय के रास्ते से भटक जाते हैं। खुदा फरमाता है: वह हर काम पर नज़र रखे हुए हैं। इसलिए इंसाफ के मामले में सावधान रहें। इंसाफ कायम करना धर्मपरायणता (तक़वा) के सबसे करीब है।
وَلَا تَكۡتُمُوا الشَّهَادَةَ ؕو َمَنۡ يَّكۡتُمۡهَا فَاِنَّهٗۤ اٰثِمٌ قَلۡبُهٗؕ وَللّٰهُ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ عَلِيۡمٌ ﴿۲۸۳﴾
Q-02:283और गवाही को न छिपाओ। जो कोई इसे छिपाता है, उसका दिल गुनाहगार हो जाता है। और अल्लाह अच्छी तरह जानता है कि तुम क्या करते हो।
يٰۤـاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا كُوۡنُوۡا قَوَّامِيۡنَ بِالۡقِسۡطِ شُهَدَآءَ لِلّٰهِ وَلَوۡ عَلٰٓى اَنۡفُسِكُمۡ اَوِ الۡوَالِدَيۡنِ وَالۡاَقۡرَبِيۡنَ ؕ اِنۡ يَّكُنۡ غَنِيًّا اَوۡ فَقِيۡرًا فَاللّٰهُ اَوۡلٰى بِهِمَاۚ فَلَا تَتَّبِعُوا الۡهَوٰٓى اَنۡ تَعۡدِلُوۡا ۚ وَاِنۡ تَلۡوٗۤا اَوۡ تُعۡرِضُوۡا فَاِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ خَبِيۡرًا ﴿۱۳۵﴾
Q-04:135हे ईमान वालों! न्याय पर अडिग रहो और अल्लाह के लिए गवाही दो, चाहे वह तुम्हारे अपने ख़िलाफ़ हो या माता-पिता और रिश्तेदारों के ख़िलाफ़। चाहे कोई अमीर हो या ग़रीब, अल्लाह का दोनों पर ज़्यादा हक़ है। इसलिए अपनी इच्छाओं के पीछे न चलो, कहीं ऐसा न हो कि तुम न्याय से भटक जाओ। अगर तुम अस्पष्ट गवाही देते हो या मुँह मोड़ लेते हो, तो यकीनन अल्लाह तुम्हारे हर काम से वाकिफ़ है।
يٰۤـاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا كُوۡنُوۡا قَوَّا امِيۡنَ لِلّٰهِ شُهَدَآءَ بِالۡقِسۡطِ ؗ وَلَا يَجۡرِمَنَّكُمۡ شَنَاٰنُ قَوۡمٍ عَلٰٓى اَ لَّا تَعۡدِلُوۡا ؕ اِعۡدِلُوۡا هُوَ اَقۡرَبُ لِلتَّقۡوٰىؗ وَاتَّقُوا اللّٰهَ ؕ اِنَّ اللّٰهَ خَبِيۡرٌۢ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ ﴿۸﴾
Q-05:08हे ईमान वालों! अल्लाह के लिए डटे रहो, न्याय के गवाह बनो, और किसी समुदाय के प्रति नफ़रत तुम्हें न्याय से दूर न कर दे। न्याय करो; यही परहेज़गारी के ज़्यादा करीब है। और अल्लाह से डरो। बेशक, अल्लाह तुम्हारे कामों से वाकिफ़ है।
13. अहंकार! कुफ्र (अविश्वास) का रास्ता।
अहंकार एक ऐसा अवगुण है जो इंसान को अविश्वास की राह पर ले जाता है। ऐसा व्यक्ति खुदा की दी हुई नेमतों के लिए उसका शुक्रगुजार नहीं होता। बल्कि, वह सोचता है कि उसके पास जो कुछ भी है, वह उसकी अपनी मेहनत और समझदारी का नतीजा है। वह ज़मीन पर घमंड के साथ चलता है। वह गरीबों की अहमियत ज़मीन पर रेंगने वाले कीड़ों से ज़्यादा नहीं समझता। जो लोग खुद को सफल मानते हैं, वे खुदा की नज़र में नाकाम हैं।
शैतान की मिसाल से भी यही सबक मिलता है कि अहंकार ने उसे बहिष्कृत बना दिया। खुदा उन विश्वासियों से प्रेम करते हैं जो विनम्र और आज्ञाकारी हैं। खुदा फरमाता है! और यह दुनियावी ज़िंदगी तो बस खेल-तमाशा है। असली और हमेशा रहने वाली ज़िंदगी तो परलोक (आख़िरत) में है।
وَالۡعَصۡرِۙ ﴿۱﴾ اِنَّ الۡاِنۡسَانَ لَفِىۡ خُسۡرٍۙ ﴿۲﴾ اِلَّا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا وعَمِلُوا الصّٰلِحٰتِ وَتَوَاصَوۡا بِالۡحَقِّ ۙ وَتَوَاصَوۡا بِالصَّبۡرِ ﴿۳﴾
Q-103:01-03अस्र के समय की कसम (1) सचमुच, इंसान घाटे में है, (2) सिवाय उनके जो ईमान लाए और नेक काम किए और एक-दूसरे को सत्य और सब्र की नसीहत दी। (3)
وَلَا تُصَعِّرۡ خَدَّكَ لِلنَّاسِ وَلَا تَمۡشِ فِى الۡاَرۡضِ مَرَحًا ؕ اِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخۡتَالٍ فَخُوۡرٍۚ ﴿۱۸﴾ وَاقۡصِدۡ فِىۡ مَشۡيِكَ وَاغۡضُضۡ مِنۡ صَوۡتِكَؕ اِنَّ اَنۡكَرَ الۡاَصۡوَاتِ لَصَوۡتُ الۡحَمِيۡرِ ﴿۱۹﴾
Q-31:18-19और लोगों से घमंड में मुँह न फेरो, और न ही ज़मीन पर अकड़कर चलो। बेशक, अल्लाह घमंडी लोगों को पसंद नहीं करता। (18) और अपनी चाल में संयम रखो और अपनी आवाज़ धीमी रखो। बेशक, सबसे बुरी आवाज़ गधों की आवाज़ होती है। (19)
وَاِذۡ قُلۡنَا لِلۡمَلٰٓٮِٕكَةِ اسۡجُدُوۡا لِاٰدَمَ فَسَجَدُوۡٓا اِلَّاۤ اِبۡلِيۡسَؕ اَبٰى وَاسۡتَكۡبَرَؗ وَكَانَ مِنَ الۡكٰفِرِيۡنَ ﴿۳۴﴾
Q-02:34और जब हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम के सामने सजदा करो," तो उन्होंने सजदा किया, सिवाय इब्लीस के। उसने इनकार किया और घमंड दिखाया, और वह इनकार करने वालों में से हो गया।
وَلَا تَمۡشِ فِى الۡاَرۡضِ مَرَحًا ۚ اِنَّكَ لَنۡ تَخۡرِقَ الۡاَرۡضَ وَلَنۡ تَبۡلُغَ الۡجِبَالَ طُوۡلًا ﴿۳۷﴾ كُلُّ ذٰ لِكَ كَانَ سَيِّئُهٗ عِنۡدَ رَبِّكَ مَكۡرُوۡهًا ﴿۳۸﴾
Q-17:37-38और ज़मीन पर घमंड से न चलो। न तो तुम ज़मीन को फाड़ सकते हो और न ही पहाड़ों की ऊँचाइयों तक पहुँच सकते हो। (37) ये घमंड की वे बुराइयाँ हैं जो तुम्हारे रब की नज़र में सबसे ज़्यादा नापसंदीदा हैं। (38)
قُلِ اللّٰهُمَّ مٰلِكَ الۡمُلۡكِ تُؤۡتِى الۡمُلۡكَ مَنۡ تَشَآءُ وَتَنۡزِعُ الۡمُلۡكَ مِمَّنۡ تَشَآءُ ؕ وَتُعِزُّ مَنۡ تَشَآءُ وَتُذِلُّ مَنۡ تَشَآءُ ؕ بِيَدِكَ الۡخَيۡرُؕ اِنَّكَ عَلٰى كُلِّ شَىۡءٍ قَدِيۡرٌ ﴿۲۶﴾
Q-03:26कहो, "हे अल्लाह, तू राजाओं का राजा है। तू जिसे चाहे राज्य देता है और जिससे चाहे राज्य छीन लेता है। तू जिसे चाहे ऊँचा दर्जा देता है और जिसे चाहे नीचा दिखाता है।" तेरे ही हाथ में सारी भलाई है। बेशक, तू हर चीज़ पर क़ाबू रखता है।
وَمَا هٰذِهِ الۡحَيٰوةُ الدُّنۡيَاۤ اِلَّا لَهۡوٌ وَّلَعِبٌؕ وَاِنَّ الدَّارَ الۡاٰخِرَةَ لَهِىَ الۡحَـيَوَانُۘ لَوۡ كَانُوۡا يَعۡلَمُوۡنَ ﴿۶۴﴾
Q-29:64और यह दुनियावी ज़िंदगी तो बस खेल-तमाशा है। असल ज़िंदगी तो परलोक का घर ही है। काश वे यह जानते।
14. बुराई का बदला भलाई से दें।
खुदा फरमाता है! अगर कोई आपसे कुछ बुरा कहे, तो उसे बुरे शब्दों में जवाब न दें। इसके बजाय, कुछ बहुत अच्छी बात कहें। और खुदा सब कुछ देख रहा है।
اِدۡفَعۡ بِالَّتِىۡ هِىَ اَحۡسَنُ السَّيِّئَةَ ؕ نَحۡنُ اَعۡلَمُ بِمَا يَصِفُوۡنَ ﴿۹۶﴾
Q-23:96और बुरी बात का जवाब बेहतर बात से दें। और वे जो कुछ कहते हैं, उसे हम अच्छी तरह जानते हैं।
15. सलाम (अभिवादन)।
"अस-सलामु अलैकुम" (आप पर शांति हो)! ये सिर्फ़ दो शब्द नहीं, बल्कि दुआओं का एक तोहफ़ा है। एक ऐसा तोहफ़ा जो देने वाले और लेने वाले, दोनों के पुण्य को बढ़ाता है। यह ईश्वर की ओर से मिला एक बरकत वाला और पवित्र तोहफ़ा है। इसलिए, ईश्वर का आदेश है कि जब आप अपने घरों में जाएँ, तो घर के लोगों को सलाम करें।
فَاِذَا دَخَلۡتُمۡ بُيُوۡتًا فَسَلِّمُوۡا عَلٰٓى اَنۡفُسِكُمۡ تَحِيَّةً مِّنۡ عِنۡدِ اللّٰهِ مُبٰرَكَةً طَيِّبَةً ﴿۶۱﴾
Q-24:61जब आप घरों में प्रवेश करें, तो अपने लोगों को सलाम करें। यह अल्लाह की ओर से एक बरकत वाला और पवित्र उपहार है।
जब इंसानी रूप में फ़रिश्ते अब्राहम As के पास अच्छी ख़बर लेकर आए, तो वे उनके लिए अजनबी थे। तब अब्राहम ने उनको मुसाफिर जानकर सलाम किया। और उन्होंने उनके लिए खाना भी तैयार किया। खुदा की यह आयत साबित करती है कि रिश्तेदारों और मोमीनों के साथ-साथ अजनबियों को भी सलाम किया जा सकता है। क्योंकि अब्राहम को तब तक यह पता नहीं था कि उनके मेहमान फ़रिश्ते हैं, जब तक कि उन्होंने फ़रिश्तों के सामने खाना नहीं परोस दिया।
{यह दलील इसलिए पैश की है। क्योंकि बहुत से उलमा का ख्याल है कि काफिर को “सलाम” नहीं किया जा सकता। दूसरा यह कि! खुदा ने काफिर की मौत के बाद काफिर के हक मे दुआ करने से मना किया है। जीवित रहते नहीं।}
وَلَقَدۡ جَآءَتۡ رُسُلُنَاۤ اِبۡرٰهِيۡمَ بِالۡبُشۡرٰى قَالُوۡا سَلٰمًا ؕ قَالَ سَلٰمٌ ﴿۶۹﴾
Q-11:69और सचमुच, हमारे फ़रिश्ते इब्राहीम के पास शुभ समाचार लेकर आए। उन्होंने कहा: "सलाम!" इब्राहीम ने जवाब दिया: "सलाम!"
खुदा पैगंबर ﷺ से फरमाता है कि जब आपके पास मोमिन आएं, तो उनका अभिवादन "अस्सलामु अलैकुम" कहकर करें। और फिर खुदा फरमाता है कि आपके रब ने अपने ऊपर दया करना फ़र्ज़ कर लिया है। इससे यह साबित होता है कि जब एक ईमान वाला दूसरे ईमान वाले का अभिवादन "अस्सलामु अलैकुम" कहकर करता है, तो उस पर खुदा की रहमत (दया) लाज़िम (अनिवार्य) हो जाती है।
وَاِذَا جَآءَكَ الَّذِيۡنَ يُؤۡمِنُوۡنَ بِاٰيٰتِنَا فَقُلۡ سَلٰمٌ عَلَيۡكُمۡ كَتَبَ رَبُّكُمۡ عَلٰى نَفۡسِهِ الرَّحۡمَةَ ۙ ﴿۵۴﴾
Q-06:54और जब वे लोग आपके पास आएं जो हमारी आयतों पर ईमान रखते हैं, तो कहें: "अस्सलामु अलैकुम" तुम्हारे रब ने अपने ऊपर दया करना तय कर लिया है।
खुदा फरमाता है अगर कोई आपको किसी अभिवादन (सलाम) से संबोधित करे, तो आपको उससे बेहतर अभिवादन (सलाम) के साथ जवाब देना चाहिए। या कम से कम उन्हीं शब्दों में जवाब देना चाहिए।
उदाहरण:-
जब कोई आपसे कहे! "अस-सलामु-अलैकुम" [तुम पर सलामती (शांति) हो।]
तब आपको जवाब देना चाहिए! “वालेकुम अस्सलाम वरहमतुल्लाह वबरकातूह।” (और आप पर शांति, अल्लाह की रहमत और उसकी बरकत हो), यह जवाब "अस-सलामु अलैकुम" से ज़्यादा व्यापक और बरकत वाला है।
या कम से कम उनकी बात को ही जवाब मे लोटा दें! जैसे, कहें "वालैकुम अस्सलाम" (और आप पर भी शांति हो)।
وَاِذَا حُيِّيۡتُمۡ بِتَحِيَّةٍ فَحَيُّوۡا بِاَحۡسَنَ مِنۡهَاۤ اَوۡ رُدُّوۡهَا ؕ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَلٰى كُلِّ شَىۡءٍ حَسِيۡبًا ﴿۸۶﴾
Q-04:86और जब तुम्हें कोई सलाम करे, तो उससे बेहतर सलाम का जवाब दो या कम-से-कम वैसा ही जवाब दो। बेशक, अल्लाह हर चीज़ का हिसाब रखने वाला है।
क़यामत के दिन, फ़रिश्ते जन्नत के रास्ते में और उसके दरवाज़े पर लोगों का स्वागत "अस-सलामु अलैकुम" कहकर करेंगे। और जन्नत के अंदर रहमान व रहीम रब की तरफ़ से भी यही “सलाम” सुनाई देगा। तो सोचिए, खुदा ने सलाम के इन दो शब्दों को कितना बरकत वाला और रहमत से भरा बनाया है।
وَسِيۡقَ الَّذِيۡنَ اتَّقَوۡا رَبَّهُمۡ اِلَى الۡجَـنَّةِ زُمَرًاؕ حَتّٰٓى اِذَا جَآءُوۡهَا وَفُتِحَتۡ اَبۡوَابُهَا وَقَالَ لَهُمۡ خَزَنَتُهَا سَلٰمٌ عَلَيۡكُمۡ طِبۡتُمۡ فَادۡخُلُوۡهَا خٰلِدِيۡنَ ﴿۷۳﴾
Q-39:73और जो लोग अपने रब से डरते हैं, उनके झुंड-के-झुंड जन्नत की ओर ले जाए जाएंगे। यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे और उसके दरवाज़े खोल दिए जाएँगे, तो उसके रखवाले फ़रिश्ते कहेंगे, "तुम पर “सलाम” हो! तुमने अच्छा काम किया है, इसलिए इसमें हमेशा रहने के लिए दाखिल हो जाओ।"
هُمۡ وَاَزۡوَاجُهُمۡ فِىۡ ظِلٰلٍ عَلَى الۡاَرَآٮِٕكِ مُتَّكِـــُٔوۡنَ ﴿۵۶﴾ لَهُمۡ فِيۡهَا فَاكِهَةٌ وَّلَهُمۡ مَّا يَدَّعُوۡنَ ﴿۵۷﴾ سَلٰمٌ ࣞ قَوۡلًا مِّنۡ رَّبٍّ رَّحِيۡمٍ ﴿۵۸﴾
Q-36:58“आप पर सलाम हो”! अत्यंत मेहरबान रब की तरफ से। यह संदेश स्वर्ग मे सुना जाएगा।
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